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सरोकार  | 07.07.2008

जी-8 की चुनौतियां- पर्यावरण, बढ़ती क़ीमतें और ज़िम्बाब्वे

जापान के होकाइडो द्वीप पर टोयाको रिसॉर्ट में दुनिया के आठ बड़े औद्योगिक देशों को शिखर सम्मेलन हो रहा है. सम्मेलन के मुख्य मुद्दों पर एक नज़र.

कठिन आर्थिक चुनौतियां

जी-8 के नेता उन आठ लोकतांत्रिक देशों की 90 करोड़ की जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिसके पास 30 खरब डॉलर हैं यानि दुनिया की आधी से ज़्यादा संपत्ति. इसलिए उनसे उम्मीद भी की जा सकती है कि वे दुनिया में इस समय चल रहे दो सबसे बड़े मुद्दों का हल ढूंढ निकालें--ग्लोबल वॉर्मिंग और खाद्य संकट. लेकिन यह आसान नही है.

तेल की बढ़ती क़ीमतों के कारण खाद्य संकट का खतराBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  तेल की बढ़ती क़ीमतों के कारण खाद्य संकट का खतराऊर्जा और खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों की वजह से सब कुछ महंगा होता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता से भी आर्थिक विकास ठीक से नहीं हो पा रहा. और आने वाले दिनों में राहत मिलने की कोई आशा नहीं दिख रही है. तेल की बढ़ती क़ीमतों की वजह से यह समस्या और बढ़ेगी, कंपनियों के मुनाफे ज़्यादा नहीं होंगे और ग्राहकों की खर्च करने की क्षमता भी कम होगी.

जी-8 देश इस समस्या के बारे में खुद भी कुछ खास नहीं कर सकते. तेल के करों में छूट देकर कुछ देर तक समस्या टाली जा सकती है लेकिन लंबे समय के लिए नहीं. जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल नवीकरणीय ऊर्जा की वक़ालत करती आई हैं लेकिन इस समय बन रहीं योजनाओं का असर बहुत वर्षों बाद ही देखने को मिलेगा.

मुद्रास्फीति के लिए केन्द्रीय बैक ज़िम्मेदार होते हैं. यूरोपीय केन्द्रीय बैंक ने ब्याज दरें बढ़ाने की घोषणा की है. इसके बाद कई और बैंकों ने भी इसी प्रकार के संकेत दिये हैं. आम तौर पर जब आर्थिक विकास धीमा हो जाता है तो ब्याज दरें कम कर दी जाती हैं. लेकिन इस समय रुझान उल्टा है.

बांग्लादेश में चावल की भारी कमीBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  बांग्लादेश में चावल की भारी कमीखाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतें

खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों के संकट के चलते जी-8 से केवल एक गुज़ारिश की जा रही है- दुनिया के ग़रीब देशों के लिए एक ऐसा लक्ष्यबद्ध सहायता कार्यक्रम बनाया जाए जिससे कृषिजगत का  विकास हो और ये देश खुद अपना पेट भर सकें.

कई दशकों बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि कृषि में निवेश एक मुख्य मुद्दा बना है. इस सम्मेलन के दौरान अफ्रीकी और एशियाई देशों की उपस्थिति से इस मुद्दे की ओर ध्यान आकर्शित किया जा सकता है.

लेकिन यी मुद्दा, एक और समस्या के साथ सीधे संबंधित है और वह है आसमान छूतीं तेल की क़ीमतें. खाद्य पदार्थों की क़ीमतें तेल की क़ीमतों पर निर्भर होती हैं. लेकिन कई और कारण भी हैं जिनकी वजह से महंगाई बढ़ी हैं. मिसाल के तौर पर जैविक ऊर्जा के लिए बीजों की मांग. किसानों से मकई उगाने की मांग की जा रही है और वे अन्य अनाज उगाने के बदले मकई उगा रहे हैं. इससे अनाज उगाने वाले किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति बुश इस बात से सहमति नहीं है कि बायो-ऊर्जा के लिए मकई की बढ़ती मांग से खाने-पीने की चीज़ें महंगी हो रही हैं.

फिर भी विश्व व्यापार पर रुकी हुई बातचीत आगे बढ़ाने के लिए जी-8 देश राजनीतिक दबाव डाल सकते हैं. अगर 2001 में दोहा-राउंड की बातचीत सफल हो जाती है तो विकासशील देश कृषि उत्पाद निर्यात कर सकेंगे और चीन और भारत जैसे देशों में व्यापार बढ़ेगा. लेकिन इसके लिए यूरोपीय संघ को भी अपने बाज़ार और ज्यादा खोलने होंगे और अपने किसानों को दी गई सब्सिडी में कटौती करनी होगी.

लेकिन इस समय खाद्य संकट के चलते निर्यात करने वाले मुख्य देशों ने निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखे हैं. जी-8 देशों से मांग की जाएगी कि वे इन प्रतिबंधों में ढील देने के लिए दबाव बढ़ाएं.

चीन के एक कारखाने से उत्सर्जित ज़हरीली गैसेंBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  चीन के एक कारखाने से उत्सर्जित ज़हरीली गैसेंपर्यावरण सुरक्षा के लक्ष्य

पिछले साल जर्मनी के हाइलिगेनडाम में हुई जी-8 देशों की बैठक में जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल के नेतृत्व में नेताओं ने 2050 तक ग्रीनहाउज़ गैसों के उत्सर्जन में 50 फीसदी कटौती का लक्ष्य पर सहमति बनाई थी. लेकिन अब शायद जापान में इस लक्ष्य को औपचारिक घोषणा में बदलने पर बहस हो सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश कह चुके हैं कि जब तक भारत और चीन के लक्ष्य बाकी देशों के लक्ष्यों के साथ मेल नहीं खाते, तब तक इस समस्या का समाधान मुश्किल ही है.

जापान के प्रधानमंत्री यासुओ फाकूदा चाहते हैं कि 2012 में समाप्त होने वाली क्योटो संधि के बाद किसी समझौते पर सहमति बन जाए लेकिन ऐसा होना मुश्किल लग रहा है. सभी सदस्य देशों के बीच इस विषय को लेकर मतभेद हैं लेकिन अमेरिकी सरकार 2050 के लक्ष्य के प्रति बाध्य होने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहा.

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजैंसी की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि ऊर्जा क्षेत्र में तुरंत दीर्घकालीन योजनाओं की ज़रूरत है. उदाहरण के तौर पर शोध, विकास और नई तकनीक में भारी निवेश--हर साल 2010 से 2050 तक--लगभग 55 कोयले के पावर प्लांट का निर्माण जिनमें से ज़हरीली गैसों का उत्सर्जन शूण्य के बराबर हो, 32 परमाणु ऊर्जा प्लांट, 17500 पवन बिजली घरों का निर्माण और 21.5 करोड़ वर्ग मीटर के सौर ऊर्जा पैनल...ये भी साल दर साल, लगातार 40 वर्षों तक. इसके लिए कुल 62 खरब डॉलर की ज़रूरत होगी.

नाइजर में रहने वाला तीन साल का आमीसो कुपोषण का शिकार है. उसका वज़न केवल 5.8 किलो है. Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  नाइजर में रहने वाला तीन साल का आमीसो कुपोषण का शिकार है. उसका वज़न केवल 5.8 किलो है. अफ्रीका को दिये गए खोखले वादे

2005 में स्कॉटलैंड के ग्लेनेगेल्स में हुए शिखर सम्मेलन के दौरान अफ्रीका के लिए जो वादे किए गए थे, वे अब तक पूरे नहीं किये गए हैं. वादे सरल थे-

-2010 तक अफ्रीका के लिए मदद दोगुनी करना यानि कुल 25 अरब डॉलर की सहायता प्रदान करना.

-अफ्रीकी नेताओं ने वादा किया था कि वे अपने देशों में संकट रोकने की कोशिश करेंगे और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ेंगे.

इन दोनों में से किसी ने भी अपने वादे पूरे नहीं किये हैं. इस बीच स्थिति और ख़राब हो गई है. कुछ हद तक अफ्रीकी देशों के ऋण माफ किये गए हैं लेकिन मदद का पैसा, तय की गई समयसारिणी के मुताबिक नहीं बल्कि काफी देर से पहुंच रहा है. सहायता संस्थाओं का कहना है कि अफ्रीका को अब तक 25 अरब डॉलरों में से केवल एक-चौथाई का ही आश्वासन दिया गया है. आशंका है कि कि जापान में भी जी-8 देश 25 अरब डॉलर की सहायता की औपचारिक घोषणा नहीं करेंगे.

अफ्रीका भी अपने वादों पर खरा नहीं उतरा है. लगभग हर देश में संकट जारी है. सोमालिया, नाइजर, कॉंगो, चाड, सूडान, एरिट्रिया, जिबूती और अब ज़िम्बाब्वे.

रॉबर्ट मुगाबे के खिलाफ़ प्रतिबंध कड़े करने की कोशिशBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  रॉबर्ट मुगाबे के खिलाफ़ प्रतिबंध कड़े करने की कोशिशज़िम्बाब्वे

एक हफ्ता पहले मिस्र में हुई अफ्रीकी संघ की बैठक के दौरान अफ्रीकी नेताओं ने ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे पर प्रतिबंध लगाने के प्रति कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई. दिलचस्प बात यह है कि इन देशों से भेजे गए चुनाव पर्यवेक्षकों ने खुद इस बात की पुष्टि की है कि वहां 27 जून को हुए राष्ट्रपति चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं थे.

यह पहले से ही स्पष्ट कर दिया गया है कि जी-8 शिखर सम्मेलन में ज़िम्बाब्वे के बारे में बात होगी. यूरोपीय संघ ने चुनावों को मान्यता देने से इंकार कर दिया है और मुगाबे और उनकी सरकार पर यात्रा और संपत्ति से संबंधित प्रतिबंध लगा दिए हैं. जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल कहती आई हैं कि प्रतिबंध और कड़े करने के सिलसिले में वे अफ्रीकी देशों का समर्थन चाहती हैं. माना जा रहा है कि अंतिम घोषणा पत्र में इसका कड़े शब्दों में ज़िक्र किया जाएगा. लेकिन रूस शायद इस पर आपत्ति करे.

जापन के सापोरो में जी-8 के खिलाफ प्रदर्शनBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  जापन के सापोरो में जी-8 के खिलाफ प्रदर्शनजी-8 समूह के पास बहुत कुछ बदलने की क्षमता है लेकिन इस बार भी किसी ठोस परिणामों की उम्मीदें नही की जा रही हैं.  कड़ी सुरक्षा के बीच जापान में हज़ारों लोग विरोध प्रदर्शन कर जी-8 से अपने वादे पूरे करने की मांग कर रहे हैं. ऑक्सफैम सहायता संस्था की जापान शाखा के प्रवक्ता ताकूदो यामादा कहते हैं-

"टोयाको के खूबसूरत रिसॉर्ट में मज़े करने के बजाय उन्हें अफ्रीका को दिये गए वादों को पूरा करना चाहिये. उन्हें ग्लोबल वॉर्मिंग और खाद्य संकट के चलते अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास होना चाहिये. "

 

सुनन्दा राव

 

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