रंग तरंग | 05.08.2008
सोलझेनित्सिन: शीतयुद्ध व निर्वासन में कसमसाती रचनात्मकता
3 अगस्त को आलेक्सांदर सोलझेनित्सिन के देहांत के साथ रूसी व विश्व साहित्य के एक युग का अंत हुआ. शीतयुद्ध के बाद की पीढ़ी के लिए एक अतीत, जिसे समझ पाना शायद मुश्किल ही है.
सोवियत साहित्य पत्रिका नोवी मीर में 1962 में एक छोटा सा उपन्यास प्रकाशित हुआ इवान देनिसोविच के जीवन का एक दिन - और सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस में ख्रुश्चोव द्वारा स्तालिन के बर्बर दौर के पर्दाफ़ाश के बावजूद पहली बार सोवियत पाठकों को पता चला कि श्रम शिविरों में किस तरीके से मानवता को पैरों तले रौंदा जाता था. लेखक आलेक्सांदर सोलझेनित्सिन खुद सात साल तक क़ैद में थे, और इस पुस्तक में उन्होंने वहां के यथार्थ का मार्मिक वर्णन पेश किया है, जिसकी बारीकियां हमें उनकी अगली रचनाओं, मसलन प्रथम चक्र, कैंसर वार्ड, या ख़ासकर गुलाग आर्किपेलागो में देखने को मिलता है.
Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: 2006 में पहली बार रूस में समग्र रचनाओं का प्रकाशनइवान देनिसोविच सोलझेनित्सिन की एकमात्र रचना थी, जो तत्कालीन सोवियत संघ में पहले छपने के बाद विदेश में प्रकाशित हुई. उनकी अन्य रचनाएं विदेश में ही प्रकाशित हो पाई. 1964 में ख्रुश्चोव को पार्टी महासचिव के पद से हटा दिया गया, श्रम शिविर गुलाग का सिलसिला आगे चलता रहा. आलोचनात्मक रचनाओं का गला फिर एकबार घोंट दिया गया.
1970 में सोलझेनित्सिन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें डर था कि अगर वे पुरस्कार लेने स्वीडन जाते हैं, तो उन्हें स्वदेश वापस नहीं आने दिया जाएगा. उनका भाषण छिपाकर सोवियत संघ से बाहर भेजा गया था. इसमें उन्होंने कहा था - सच्चाई के एक शब्द का वज़न सारी दुनिया से अधिक होता है.
चार साल बाद 1974 में सोलझेनित्सिन की सोवियत नागरिकता छीन ली गई और उन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया गया. वे अमरीका के कैवेंडिश में रहने लगे. लेकिन पश्चिम की दुनिया भी उन्हें रास नहीं आई. उनकी राय में पश्चिम का लोकतंत्र निर्जीव बना देता है, समृद्धि पतनोन्मुखता को प्रोत्साहित करती है.
Bildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift: अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोंसोवियत संघ में आए परिवर्तन के बाद 1990 में मिखाईल गोर्बाचोव ने सोलझेनित्सिन की नागरिकता वापस लौटाई. 1994 में वे रूस वापस लौटे. लेकिन रूस की हालत से भी वे बेहद खिन्न थे. वे रूस के आर्थिक संकट और उसकी सैनिक कमज़ोरी के लिए गोर्बाचोव और येल्त्सिन को ज़िम्मेदार समझते थे. उनका मानना था कि रूस अब पश्चिम के सामने झुकता जा रहा है, जो एक विकल्प के रूप में उनके लिए असहनीय था.
लेखक के रूप में निडर होकर सच कहने की हिम्मत सोलझेनित्सिन की विशेषता थी. उनका सरोकार सामाजिक था. सामाजिक धरातल पर जिस सच्चाई की खोज में उन्होंने कलम उठाई, वह उन्हें कहीं नहीं दिखी - सोवियत समाजवाद में नहीं, पश्चिम के आलोकित लोकतंत्र में नहीं. समाजवाद के बाद उभरे स्वदेश रूस में ही नहीं. एक निराश व्यक्ति, जिसने सारी दुनिया को प्रभावित किया.







