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खोज  | 03.09.2008

किधर बैठती हैं गायें

गाय की पूजा भारत में होती है, लेकिन यह खोज जर्मनी में हुई है कि सुखी गायें नीले गगन तले हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा के बीच चरती-पगुराती हैं और उनके बीच रहने से दमा और चर्मरोग होने की संभावना घटती है.

गायों को प्रिय है उत्तर-दक्षिण दिशा

यह खोज गाय-भक्त भारत के नहीं, जर्मनी के वैज्ञानिकों की है. संसार भर की सुखी गायें नीले गगन तले चरते-पगुराते या सोते-आराम करते समय अपने आपको यथासंभव उत्तर-दक्षिण दिशा के बीच व्यवस्थित करती हैं. यानी, उनका शरीर हमेशा उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के बीच की काल्पनिक रेखा के समानांतर होता है. या, बहुत हुआ तो एक-आध अंश का अंतर होता है. यह खोज करने वाले जर्मन वैज्ञानिकों का मानना है कि गायों के इस गुण का उनके सुख-संतोष और दूध के लिए बहुत महत्व होना चाहिये, वर्ना संसार भर की गायें ऐसा नहीं करतीं. इस खोज के बाद से जर्मनी के गाय पालक सोच में पड़ गये हैं कि क्या अब उन्हें अपनी गौशालाएँ भी इस तरह नहीं बनानी चाहियें कि गायें वहाँ भी उत्तर-दक्षिण दिशा के बीच खड़ी रह सकें! जर्मन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि शायद गयों में भी, चिड़ियों की तरह ही, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की सहायता से दिशाज्ञान प्राप्त करने की अब तक अज्ञात रही कोई क्षमता है. उन्हें गायों के इस दिशाबोध का ज्ञान चार महीनों तक संसार भर में 308 चरागाहों पर चर रही 8500 गयों के अवलोकन से प्राप्त हुआ है. इन में भारत की गायें भी शामिल थीं. विस्तृत विवरण के लिए सुनते रहिये अगले दिनों में रेडियो पर हमारा खोज कार्यक्रम.

गोपाल बनिये, दमे से बचिये

जर्मनी और न्यूज़ीलैंड के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि कि ऐसे बच्चों को दमा और चर्मरोग होने की संभावना कम हो जाती है, जिन की गायों के बीच उठने-बैठने से दमा और चर्मरोग दूर रहता हैBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  गायों के बीच उठने-बैठने से दमा और चर्मरोग दूर रहता हैमाताएँ अपने गर्भ के समय मवेशियों, घास-फूस और अनाजों के संपर्क में रही हैं. यदि बाद में बच्चा भी मवेशियों और अनाजों के साथ लंबे संपर्क में रहता है, तो इस प्रकार के अन्य एलर्जी रोगों की संभावना भी कम होती जाती है. इससे पहले भी देखा गया है कि जो बच्चे देहातों में रहते हैं, गाय का ताज़ा दूध पीते हैं और गायों के साथ समय बिताते हैं, उन्हें एलर्जी वाली बीमारियाँ बहुत कम होती हैं. विज्ञान में इस के लिए एक नया शब्द भी गढ़ा गया है—फ़ार्म हाउस इफ़ेक्ट, अर्थात किसान-घर प्रभाव.

मधुमेह कैंसर को भी न्योता दे सकता है

जर्मनी के अंतःरोग विशेषज्ञों के संघ का कहना है कि जिन लोगों को मधुमेह का रोग है, उन्हें कैंसर होने का ख़तरा और भी बढ़ जाता है. इसलिए मधुमेह के रोगियों को चाहिये कि वे सतर्कता के तौर पर समय-समय पर कैंसर की जाँच भी करवाया करें. जिन लोगों को बुढ़ापे में होने वाले मधुमेह के टाइप-2 की शिकायत है, उन्हें पाचनतंत्र और यकृत का कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है. जर्मनी में देखा गया है कि मधुमेह के रोगियों को, अन्य लोगों की अपेक्षा, बड़ी आँत का कैंसर होने का ख़तरा 30 प्रतिशत और पैंक्रियास अर्थात अग्न्याशय का कैंसर होने का ख़तरा 700 गुना बढ़ जाता है. मधुमेह के रोगी क्योंकि कार्बोहइड्रेट और वसा-दार भोजन अधिक खाते हैं और उनके शरीर में इन्सुलिन भी अधिक होता है, इसलिए समझा जाता है कि इससे उन में कैंसर की तरफ झुकाव भी बढ़ता है. यह बात पहले से ही जानी जाती है कि इन्सुलिन शारीरिक विकास को बढ़ावा देने वाली चीज़ है, इसलिए वह कोषिका-विभाजन को भी प्रोत्साहित करती है. उसके इस गुण का लाभ उठा कर कैंसर की कोषिकाओं की संख्या भी संभवतः बढ़ने लगती है. विशेषज्ञों की सलाह है कि मधुमेह के रोगियों को चाहिये कि समय रहते कैंसर का पता लगाने के विचार से वे 50 साल की आयु के बाद हर पाँच वर्ष पर अपने पाचनतंत्र की जाँच करवाया करें.

अक्ल के दाँत से स्टेम सेल मिले बहुमुखी विकास की क्षमता वाला जापान में विकसित मानवीय स्टेम सेलBildunterschrift: Großansicht des Bildes mit der Bildunterschrift:  बहुमुखी विकास की क्षमता वाला जापान में विकसित मानवीय स्टेम सेल

बहुमुखी क्षमता वाली अविभेदित कोषिकाएँ पाने के लिए, जिन्हें स्टेम सेल कहा जाता है, मानव भ्रूणों की हत्या करना अनिवार्य नहीं रह जायेगा. जापान के शोधकर्ताओं ने स्टेम सेल पाने के एक और स्रोत का पता लगाया है. वे 10 साल की एक लड़की के अक्ली दाँत से स्टेम सेल पाने में सफल रहे हैं. अपने प्रयोग का टोकियो में वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि दाँत से प्राप्त कोषिकाओं के जीनों में तीन ऐसे जीन मिलाने के बाद, जिन्हें प्लूरीपोटेंट, अर्थात सर्वसक्षम बनाने या बहुमुखी क्षमता प्रदान करने वाले जीन समझा जाता है, इन कोषिकाओं को उन्होंने 35 दिनों तक संवर्धित किया. संवर्ध वाली कोषिकाओं में वही गुण थे, जो बहुमुखी क्षमता वाले स्टेम सेलों में होते हैं. इस शोध टीम के नेता हजिमे ओगूशी ने बताया कि इस प्रयोग से एक तरफ़ स्टेम सेल पाने की नैतिकता के बारे में बहस का अंत हो सकता है और दूसरा लाभ यह है कि अक्ली दाँतों का अब सदुपयोग होने लगेगा, क्योंकि अब तक तो उन्हें उखाड़ने के बाद हमेशा फेंक दिया जाता था. ओगूशी ने कहा कि युवावस्था में निकाले गये किसी व्यक्ति के अक्ली दाँतों को किसी प्रशीतक की बर्फीली ठंड में इस तरह जमा कर रखा जा सकता है कि बाद में ज़रूरत पड़ने पर उससे प्राप्त स्टेम सेलों की सहायता से उस व्यक्ति के शरीर में प्रतिरोपण लायक कोई नया अंग विकसित और प्रतिरोपित किया जा सके. लेकिन, इस तरह के प्रथम परीक्षण करने में अभी कम-से-कम पाँच और वर्ष लगेंगे.

 

संकलनः राम यादव

 

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